मूवी रिव्यूःजग्गा जासूस

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फिल्म जग्गा जासूस की शुरुआत में बजने वाली लाइनें श्सामने वाली सीट पर पैर न रखना, फेसबुक- वॉट्सऐप ऑफ रखना। म्यूजिकल कहानी है, दिल से बनाई है, दिल से सुनानी हैश् आपको इशारा दे देती है कि अब तीन घंटे आपको सारा ध्यान पर्दे पर फोकस करना होगा। वरना आप कुछ मिस कर देंगे। इससे पहले श्बर्फीश् जैसी सुपरहिट फिल्म बना चुके अनुराग ने इस बार भी अलग अंदाज में म्यूजिकल सिनेमा रचा है, जिसे बनाने में उन्होंने अपनी जिंदगी के कई साल लगा दिए। 2014 में शुरू हुई इस फिल्म की शूटिंग बीते साल पूरी हुई। उसके बाद कई बार रिलीज डेट टलने के बाद आखिरकार जग्गा जासूस रिलीज हो ही गई। फिल्म एक अनाथ और हकले बच्चे जग्गा ( रणबीर कपूर) की कहानी है, जिसे एक हॉस्पिटल की नर्स ने पाला था। बचपन से जासूसी का शौक रखने वाले जग्गा की जिंदगी हॉस्पिटल में आए एक मरीज बादल बागची उर्फ टूटी-फ्रूटी (शाश्वत चटर्जी) से मिलकर बदल जाती है। वह न सिर्फ उसे गाकर अपनी बात बोलना सिखाता है, बल्कि उसे हॉस्पिटल से उसे अपने घर भी ले जाता है। दोनों हंसी-खुशी अपनी जिंदगी बिता रहे थे, लेकिन एक दिन पुलिस ऑफिसर सिन्हा ( सौरभ शुक्ला) उनके घर पर छापा मारता है। उसे देखकर बागची जग्गा को लेकर भाग जाता है और उसका ऐडमिशन मणिपुर के एक बोर्डिंग स्कूल में करा देता है।
दरअसल, कोलकाता के प्रफेसर बादल बागची का कनेक्शन 1995 में वेस्ट बंगाल के पुरुलिया में गिराए गए हथियारों से भी था, जिसकी वजह से वह दुनिया की नजरों से छिपता घूम रहा था, लेकिन वह जग्गा को हर साल अलग-अलग लोकेशन से उसके बर्थडे पर एक विडियो कसेट भेजना नहीं भूलता था, जिसमें वह उसे जिंदगी के फलसफे बताता था। अपनी स्कूलिंग के दौरान कई जासूसी केस सुलझाने वाले जग्गा की मुलाकात इसी दौरान खोजी पत्रकार श्रुतिसेन गुप्ता ( कटरीना कैफ) से होती है, जो कि एक मामले की खोजबीन के सिलसिले में वहां आई थी। अपने बैड लक की वजह से तमाम मुसीबतों में फंसने वाली श्रुति में जग्गा को अपने खोए हुए बाप की झलक दिखती है, इसलिए वह मुसीबत में फंसी श्रुति की मदद करता है।

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Title: People in Kovind's village celebrate ahead of him being elected as President of India
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