रूहानीयत...........इससे पहले आप ने पढ़ा था--प्रश्न-103. महाराज जी, हम लोग आपसस में भजन के समय जी मिचल

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प्रश्न-103. महाराज जी, हम लोग आपसस में भजन के समय जी मिचलाने के अनुभव के बारे में बात कर रहे थे । क्या आप इस विषय में कुछ बतायेंगे?

उत्तरःमुझे पता नहीं‘जी मिचलाना’ महसूस करने से आपका असली भाव क्या है,जब आत्मा की धारा कण्ठ चक्र से ऊपर की ओर सिमटती है तो शुरू शुरू मंे गले में दम घुटने जैसा अनुभव होता है, ऐसा लगता है कि जैसे कि बुहत बोलने से गला सूख गया हो। उस समय यदि आप कुछ घूंट पानी पी लंे, या धीरे धीेरे गले को एक दो बार सहलायंे तो यह तकलीफ दूरी हो जाती है। अब आगे.....जब हम यहां आंखांे के केन्द्र मंे एकाग्र होने की कोशिश करते हैं तो आंखांे पर भी मामूली सा दबाव महसूस होता है, क्यांेकि हमारी आंखंे अनजाने में ऊपर की ओर पलटने लगती हैं। पर आखांे के हलके से एक या दो बार सहलाने से यह दबाव भी ठीक हो जाता है। माथे में भी साधारण सा दबाव महसूस होता है, पर उसे भी इसी प्रकार ठीक किया जा सकता हैं
जी मचलाने का अनुभव तभी होता है जब आपने कोई ऐसी चीज खाई हो जो आपको माफिक न हो, या आप ऐसे बंद कमरे मंे बैठे हों जहां ताजी हवा न आ रही हो, या फिर आप सुमिरन को श्वास की क्रिया के साथ-साथ कर रहे हों।
तब जरूर जी मचलाने का अनुभव हो सकता है। लेकिन हमें सुमिरन करते समय सांस की क्रिया के बारे में भी कभीनहीं सोचना चाहिये। अभी आप सुन रहे हैं और मैं बोल रहा हूं। न तो आपका सांस की ओर खयाल है और न ही मेरा। यह तो शरीर की प्राकृतिक क्रिया है और हमें इसकी ओर कोई ध्यान नहीं देना चाहिये।
प्रश्न-104, महाराज जी, यदि भजन के दौरान ऐसे अनुभव हों, जैसे गले के सूखने का अनुभव और फिर काफी समय तक हमें ऐसा कुछ महसूस न हो तो क्या इसका अर्थ है कि पहले तो एकाग्रता होती थी वह अब होनी बंद हो गई है?
उत्तर-नहीं, कभी हमें ऐसा महसूस होता है, कभी नहीं भी होता।
यदि समय आप इस तकलीफ को दूर कर चुके हैं, फिर भी हो सकता है कि यह दोबारा हो। लेकिन जब कभी भी आपके सामने ऐसी समस्या आये उस समय आप थोड़ा पानी पीकर या गले को सहला कर उसे ठीक कर सकते हैं।
प्रश्न-105, कुछ लोगांे का शरीर भजन के समय या तो बहुत गरम हो जाता है या फिर ठंडा।
भजन के समय शरीर के तापमान के बदलने की क्या वजह है?
उत्तर- अभ्यास के समय शरीर के तापमान में कोई फर्क नहीं आता। मस्तक में साधारण सी तपिश या गरमी महसूस हो सकती है। कभी कभी जब सुरत आंखांे के केन्द्र की ओर सिमटती है तो मामूली ठंड महसूस होती है, पर इतनी नहीं कि कंपकपी शुरू हो जाये। आम तौर पर सामान्य तापमान ही बना रहता है।
प्रश्न-106, महाराज जी, कभी कभी भजन के समय ऐसा महसूस होता है जैसे कोई रीढ़ की हड्डी पर ऊपर की ओर हाथ फेर रहा हो। यह कोई चिन्ता की बात तो नहीं?
उत्तर- हमें शरीर मंे कई प्रकार की क्रियाएं, झुनझुनी आदि महसूस होती हैं। कभी रीढ़ की हड्डी में भी कुछ ऐसा महसूस होता है लेकिन उसकी ओर ध्यान मत दीजिये।
प्रश्न-107, कभी कभी भजन में शरीर को झटके से लगते है।। इससे विषय में आप समझायंगे?
उत्तर- हां, कभी कभी झटके लगते हैं। कभी कभी अपनी भक्ति भावना या भावुकता की तीव्रता के द्वारा हम अपने खयाल को एकाग्र तो कर लेते हैं पर मन शरीर मंे इतना फैला होता है कि हमारे लिये अपनी आत्मा की धारा को समेट ऊपर लाना मुश्किल होता है, इसलिए तब कभी कभी इस प्रकार के झटके लगने शुरू हो जाते हैं और कुछ लोग तो बेहोश भी हो जाते हैं। पर चिन्ता की बात कोई नहीं है। भजन में शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचता।
आप फिर से उठ जायंेगी। यदि आपको ऐसे झटके महसूस हों तो आप किसी सख्त चीज का सहारा लेकर, या आराम से कुर्सी मंे बैठक कर सुमिरन कर सकती हैं।

बारहमाहा

इससे पहले आप ने पढ़ा था....माघ के महीने से मिलने वाली शिक्षा यह है कि उन्हंे ही पवित्र कहा जा सकता है जो गुरू के कृपा पात्र बन गये हांे, क्यांेकि नाम, जिसकी महिमा का यहां वर्णन किया गया है, पूरे गुरू से ही प्राप्त होता है। अब आगे.........
फलगुण अनंद उपारजना
हर सजण प्रगटे आय।
संत सहाई राम के कर
किरपा दीआ मिलाय।
सेज सुहावी सरब सुख
हुण दुक्खा नाहीं जाय।
इच्छ पुंनी वडभागणी वर पाया हर राय।
मिल सहीआं मंगल गावही
गीत गोविंद अलाय।
हर जेहा अवर न दिसई कोई दूजा लवै न लाय।
हलत पलत संवारिओन निहचल दितीअन जाय।
संसार सागर ते रखिअन बहुड़ न जनमै धाय।
जिहवा एक अनेक गुण तरे नानक चरणी पाय।
फलगुण नित सलाहीऐ जिसनांे तिन न तमाय।
भावार्थ-फाल्गुन साल का अंतिम महीना है। जिनके ह्दय मंे प्रियतम प्रभु प्रकट हो गया है, वे अब उसके मिलाप का अनंद पा रहे हैं। संत प्रभु को पाने के अभिलाषियांे की सहायता करते हैं और फाल्गुन मंे होने वाला आत्मा और परमात्मा का मिलाप भी उनकी दया से ही हुआ है। प्रभु प्रियतम के प्रकट होने पर बिरहिन आत्मा केा सभी सुख प्राप्त हो गये हैं। उसे अपने ह्दय की सेज सुंदर और मोहिनी लगती है। अब वियोग के उसे दुखी करने की कोई गुंजाइश नहीं रही। उस खुशनसीब की पति प्रभु को प्राप्त करने की तमन्ना पूरी हो गई है और वह अपनी सहेलियांे से मिलकर खुशी के गीत गा रही है, प्रियतम की महिमा का गान कर रही है। हरि अपने जैसा आप ही है। कोई और उसकी बराबरी क्या करेगा, उसके निकट भी नहीं जा सकता। उसने प्रकट होकर प्रेमी आत्मा के लोग और परलोग दोनांे संवार दिये हैं। उसे अपने चरणांे मंे अटल स्थान बख्श दिया है, उसे भवसागर से उबार लिया है।
बार बार जन्म लेने का उसका चक्कर समाप्त कर दिया है।गुरू साहिब बताते हैं कि हमारे पास जिह्वा एक है, प्रभु के गुण अनेक हैं। इसलिए उससे मिलाप किसी की अपनी कोशिश से नहीं होता। जो भी पार उतरा है, उसके चरणांे की शरण लेने से ही उतरा है। फाल्गुन का उपदेश यह है कि उस प्रियतम की सदा महिमा करनी चाहिए जो देता ही देता है, जिसकी खुद की रत्ती भर भी गरज नहीं है।

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Title: PM Modi unveils the plaque to mark dedication of
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